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बच्चों की आँखों की जाँच का महत्त्व

लड़के की आंख की जांच करवाना

बच्चों की आँखों की जाँच में किसी ऑप्टोमेट्रिस्ट या ऑफ्थेल्मॉलजिस्ट द्वारा आपके बच्चे की आँखों की सेहत का विशेषज्ञ आकलन किया जाता है।

किसी बच्चों के डॉक्टर या पारिवारिक डॉक्टर द्वारा आपके बच्चे की आँखों की संक्षिप्त जाँच, ऑप्टोमेट्रिस्ट या ऑफ्थेल्मॉलजिस्ट द्वारा की जाने वाली आँखों की जाँच का स्थान नहीं ले सकती है। केवल ऑप्टोमेट्रिस्ट और/या ऑफ्थेल्मॉलजिस्ट के पास आपके बच्चे की आँखों और नज़र का विस्तृत मूल्यांकन करने के लिए उन्नत प्रशिक्षण और क्लीनिकल टूल होते हैं।

बच्चों की आँखों की जाँचें क्यों महत्त्वपूर्ण हैं

बच्चों की आँखों की जाँचें यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं कि आपके बच्चे की आँखें स्वस्थ हों और उनमें नज़र से संबंधित ऐसी कोई समस्या न हो जो स्कूल में उसके प्रदर्शन में बाधा डाल सकती हो और संभावित रूप से आपके बच्चे की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती हो।

छोटी आयु में ही आँखों की जाँचें कराना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि बच्चों को निम्नलिखित दृष्टि कौशल चाहिए होते हैं जो चीज़ों को उपयुक्ततम ढंग से सीखने के लिए आवश्यक होते हैं:

  • दूर व पास की नज़र सही होना

  • दोनों आँखों में सटीक व सहज तालमेल का कौशल

  • आँखों को ठीक से चला पाने का कौशल

  • सटीक व सहज ढंग से फ़ोकस करने का कौशल

अपने बच्चे की आँखों की जाँच कब करवाएँ

बच्चों की आँखों की पहली संपूर्ण जाँच 6 माह की आयु में होनी चाहिए।

उसके बाद उनकी आँखों की जाँच 3 वर्ष की आयु में, और स्कूल जाना शुरू करने से ठीक पहले — लगभग 5 से 6 वर्ष की आयु में होनी चाहिए।

स्कूल जाने वाले बच्चों को हर वर्ष कम-से-कम एक बार आँखों की जाँच करवानी चाहिए, भले ही उनकी नज़र बिल्कुल ठीक हो। जो बच्चे चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस का उपयोग करते हैं उन्हें अपने आँखों के डॉक्टर की सलाह के अनुसार जाँच करवानी चाहिए।.

अपने बच्चे की आँखों की जाँच शेड्यूल करना

अपने बच्चे की आँखों की जाँच शेड्यूल करते समय, एक ऐसा समय चुनें जब वह आमतौर पर सतर्क और प्रसन्न होता हो।

आँखों की जाँच करने के तरीके की बारीक़ियां आपके बच्चे की आयु पर निर्भर करती हैं, पर आमतौर पर इसमें केस हिस्टरी, नज़र का परीक्षण, चश्मे की आवश्यकता है या नहीं इस बात का निर्धारण, आँखों के सही सीध में होने का परीक्षण, आँखों के स्वास्थ्य का मूल्यांकन और, यदि आवश्यक हो तो, चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस का प्रेस्क्रिप्शन शामिल होता है।

आपके द्वारा अपॉइंटमेंट ले लिए जाने के बाद, आपको ईमेल से एक केस हिस्टरी फ़ॉर्म भेजा जा सकता है। आँखों की देखभाल के कुछ प्रदाताओं की वेबसाइट पर भी फ़ॉर्म होते हैं जिन्हें आप अपनी मुलाकात पर जाने से पहले घर पर डाउनलोड और प्रिंट कर सकते हैं। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आपको यह फ़ॉर्म ऑप्टिशियन के क्लीनिक में पहुँचने के बाद ही मिले।

केस्ट हिस्टरी फ़ॉर्म में आपके बच्चे के जन्म इतिहास के बारे में पूछा जाएगा, जिसमें जन्म के समय भार और बच्चे का जन्म समय से पहले हुआ था या नहीं यह शामिल है।

आपके ऑप्टिशियन यह भी पूछ सकते हैं कि गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के समय कोई जटिलता हुई थी या नहीं। अन्य प्रश्न आपके बच्चे के चिकित्सा इतिहास से संबंधित होंगे, जिनमें वर्तमान में ली जाने वाली दवाएं और अतीत की या वर्तमान एलर्जियां शामिल हैं।

यदि आपके बच्चे को निम्नलिखित में से कुछ भी है या वह इनमें से कोई भी लक्षण दर्शाता है तो अपने ऑप्टिशियन को बताना न भूलें:

  • उसका जन्म समय से पहले हुआ था

  • उसने शरीर के अंग हिलाना-डुलाना, चलना-फिरना देर से सीखा था

  • वह बार-बार आँखों को मलता है

  • वह बहुत अधिक पलकें झपकाता है

  • वह नज़रें मिलाकर नहीं रख पाता है

  • उसे आँखों को चलाने और टिकाने में दिक्कत होती है

साथ ही, यदि आपका बच्चा स्कूल में या बच्चों के डॉक्टर से मुलाकात के दौरान नज़रों की जाँच में फ़ेल हुआ हो तो यह बात भी ज़रूर बताएँ।

आपके ऑप्टिशियन आपके बच्चे की पिछली नेत्र समस्याओं और उपचारों, जैसे शल्यक्रियाओं और चश्मा या कॉन्टैक्ट लेंस पहनने के बारे में भी जानना चाहेंगे।

और अपने ऑप्टिशियन को निम्नलिखित के पारिवारिक इतिहास के बारे में भी बताना न भूलें अपवर्तक (रेफ्रेक्टिव) त्रुटियों, भेंगापन, एम्ब्लायोपिया वहीं आँखों के रोग.

नवजात शिशुओं की आँखों का परीक्षण

फ़ोकस करने की योग्यता, रंगों को देख पाने, और गहराई समझ पाने के मामले में शिशुओं को 6 माह की आयु आते-आते वयस्कों के समान देख पाने में समर्थ हो जाना चाहिए।

आपके शिशु की आँखें सामान्य ढंग से विकसित हो रही हैं या नहीं यह पता लगाने के लिए ऑप्टिशियन आमतौर पर इन परीक्षणों का उपयोग करते हैं:

  • पुतली की प्रतिक्रियाओं के परीक्षण यह मूल्यांकन करते हैं कि प्रकाश की उपस्थिति या अनुपस्थिति में आँख की पुतली ठीक से खुलती और बंद होती है या नहीं।

  • "स्थिरीकरण और अनुगमन" (फ़िक्सेट एंड फ़ॉलो) परीक्षण यह पता लगाता है कि क्या आपके शिशु की आँखें किसी वस्तु, जैसे किसी प्रकाश पर टिकने, और उसके चलने पर उसका पीछा करने में सक्षम हैं या नहीं। (नवजात शिशुओं को जन्म के कुछ समय बाद ही किसी वस्तु पर नज़र टिकाने में, और 3 माह का होते-होते वस्तु का पीछा करने में समर्थ हो जाना चाहिए।)

  • वरीय दृष्टि (प्रेफ़रेंशियल लुकिंग) में ऐसे कार्डों का उपयोग किया जाता है जो एक तरफ़ खाली और दूसरी तरफ़ पट्टीदार होते हैं और इनसे नवजात शिशु की दृष्टि को पट्टियों की ओर आकर्षित किया जाता है। इस प्रकार, किसी आम नेत्र चार्ट का उपयोग किए बिना दृष्टि सक्षमताओं का आकलन किया जा सकता है।.

प्रीस्कूल बच्चों के लिए आँखों के परीक्षण

कुछ माता-पिता यह जानकर हैरान रह जाते हैं कि प्रीस्कूल-आयु वाले बच्चों को आँखों के परीक्षण करवाने के लिए अक्षरज्ञान होना आवश्यक नहीं है, तब भी नहीं जब वे बहुत छोटे हों या कुछ भी बोलने में शर्माते/हिचकते हों।

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प्रशिक्षित आँखों के परीक्षकों प्रीस्कूल बच्चें में कुछ आंखों कि स्थितिों को पहचान सकते हैं

विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए प्रयोग किए जाने वाले कुछ आम नेत्र परीक्षण इस प्रकार हैं:

  • छोटे बच्चों के लिए LEA प्रतीक, अक्षरों वाले चार्ट से किए जाने वाले नियमित नेत्र परीक्षणों जैसे होते हैं, बस इतना अंतर होता है कि इन परीक्षणों में कुछ विशेष प्रतीकों का उपयोग होता है, जैसे सेब, घर, वर्ग, और वृत्त।

  • रेटिनोस्कोपी नामक परीक्षण में आँख में प्रकाश डालकर आँख के पिछले भाग (रेटिना) से होने वाले परावर्तन का अवलोकन किया जाता है। इस परीक्षण से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि आपके बच्चे की आँख का लेंस धुंधला तो नहीं है (जन्मजात मोतियाबिंद) या उसमें कोई उल्लेखनीय अपवर्तक (रेफ्रेक्टिव) त्रुटि तो नहीं है।

  • रैंडम डॉट स्टीरियॉप्सिस

    परीक्षण में बिंदुओं के विशेष पैटर्नों और 3-डी चश्मों का उपयोग करके मापा जाता है कि आपके बच्चे की दोनों आँखें एक टीम के रूप में कितनी अच्छी तरह साथ काम करती हैं।

निकटदृष्टिता (दूर की नज़र कमज़ोर), दूरदृष्टिता (पास की नज़र कमज़ोर), और एस्टिग्मेटिज़्म के साथ-साथ, स्कूली बच्चों की नज़र संबंधी आम समस्याओं में निम्नलिखित भी शामिल होती हैं:

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मंददृष्टि और दूसरे आंख की स्थिति के लिए आपके बच्चे के आँखों कि जल्द चांच हो जाना है, क्यूंकि मंददृष्टि में एक आँख दूसरे आँख से कमजोर होता है

आलसी आँख (एम्ब्लायोपिया) आपके ऑप्टिशियन एम्ब्लायोपिया, या "आलसी आँख" की संभावना को ख़ारिज करना चाहेंगे, जो एक ऐसी स्थिति है जिसमें, एक या दोनों आँखों की संरचना में किसी भी पता लगने लायक क्षति न होने पर भी नज़र कमज़ोर होती है। दुर्भाग्य से, एम्ब्लायोपिया चश्मों या कॉन्टैक्ट लेंस से ठीक हो जाए ऐसा हमेशा नहीं होता है, और इसमें कमज़ोर आँख को शक्ति देने के लिए आई पैचिंग (ठीक आँख को ढकने) की ज़रूरत पड़ सकती है।

आँखों का सही सीध में न होना (भेंगापन)। आँखों के तिरछाने या ग़लत सीध में होने (भेंगापन) के विभिन्न कारण हो सकते हैं, जैसे प्रभावित आँख या आँखों में पेशियों के नियंत्रण से संबंधित समस्या। भेंगापन एम्ब्लायोपिया का एक आम कारण है और इसका उपचार बचपन में छोटी आयु में ही करवा लेना चाहिए ताकि नज़र और आँखों में तालमेल का कौशल सामान्य ढंग से विकसित हो सके।

अपर्याप्त अभिसारिता। इसका अर्थ पास की वस्तुओं को देखते समय आँखों को सही सीध में बनाए न रख पाने से है। अपर्याप्त अभिसारिता के कारण आँखों को असुविधा हो सकती है और पढ़ते समय दोहरी दृष्टि की समस्या भी हो सकती है।

फ़ोकस करने में समस्या, गहराई की ख़राब समझ, और वर्णांधता। आपके ऑप्टिशियन आपके बच्चे की फ़ोकस करने की योग्यता (समंजन क्षमता), गहराई की समझ, वर्ण (रंग) दृष्टि एवं अन्य चीज़ों को भी परखना चाह सकते हैं।

नेत्र स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं। आपके ऑप्टिशियन आपके बच्चे की पलकों को ध्यान से जाँचेंगे ताकि पलकों के रोमकूपों के असामान्य या संक्रमित होने, ददोरे या गाँठ होने, आँख से पानी आने और सूजन (एडीमा) का पता लगाया जा सके। धुंधलेपन (अपारदर्शिताओं) या अन्य अनियमितताओं का पता लगाने के लिए ऑप्टिशियन कॉर्निया, आइरिस और लेंस को भी जाँचेंगे।

नज़र की जाँच और स्कूल में प्रदर्शन

याद रखें कि छोटी आयु में नज़र का उपयुक्त परीक्षण यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत ज़रूरी होता है कि आपके बच्चे के पास वह दृष्टि कौशल हो जो उसे स्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए चाहिए।

यदि बच्चा छपी हुई चीज़ों या व्हाइटबोर्ड को देखने में अक्षम हो तो वह बड़ी आसानी से हताश हो सकता है, जिसके कारण उसका शैक्षणिक प्रदर्शन ख़राब हो सकता है।

नज़र की कुछ समस्याओं, जैसे आलसी आँख, का सर्वश्रेष्ठ उपचार तब ही संभव है जब उनका पता जल्द-से-जल्द, बच्चे की दृष्टि प्रणाली का विकास होने के दौरान ही चल जाए।

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